दक्षिण में मजदूरों की भारी कमी, फ्लाइट टिकट मिलने पर भी नहीं लौट रहे मजदूर
मुंबई- केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों की कंपनियां मजदूरों को वापस बुलाने के लिए फ्री हवाई टिकट दे रही हैं, लग्जरी बसें भेज रही हैं और तनख्वाह बढ़ाने के वादे कर रही हैं, फिर भी मजदूर वापस आने को तैयार नहीं हैं।
पश्चिम बंगाल और असम से काम करने आने वाले लाखों प्रवासी मजदूर घर पर ही हैं। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में वोट डालने गए ज्यादातर मजदूर लौटने में आनाकानी कर रहे हैं। इस बार लगभग सभी मजदूर वोट डालने घर गए, खास तौर पर इलेक्टोरल रोल के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर चिंताओं की वजह से। दोनों राज्यों के रिकॉर्ड मतदान इसी का नतीजा है।’
वापसी में देरी के कई अन्य कारण भी हैं, मसलन केरल में मानसून की दस्तक, स्कूलों की छुट्टियां, बकरीद का त्योहार और खेतों की बुवाई का सीजन। पश्चिम एशिया में संकट के चलते टाइल्स और प्लाईवुड रेजिन जैसी सामग्रियों की किल्लत से कुछ सेक्टर में काम वैसे भी धीमा है। केरल इस संकट का सबसे बड़ा शिकार है। राज्य में करीब 40 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं। इनमें से 70% बंगाल और असम से हैं।
कंपनियों ने हर हथकंडा अपनाया। फ्लाइट उड़ान टिकट, वेतन वृद्धि, बसें इनमें शामिल हैं। फिर भी ज्यादातर मजदूर आने के लिए तैयार नहीं हैं। तिरुपुर में हालत और भी चिंताजनक है। देश के इस सबसे बड़े निटवियर निर्यात केंद्र में उत्पादन क्षमता घटकर करीब 70% रह गई है। पश्चिम एशिया संकट से ऑर्डर पहले ही कम हैं, अब मजदूरों की कमी ने मुश्किल और बढ़ा दी है।
बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में कुछ वर्षों में औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के तेज निर्माण ने वहीं रोजगार के दरवाजे खोल दिए हैं। अगर पूर्वी और उत्तरी राज्यों में यह रफ्तार बनी रही तो भविष्य में दक्षिण भारत के लिए मजदूर जुटाना और मुश्किल हो जाएगा। इस बीच वेतन को लेकर उम्मीदें भी बढ़ रही हैं। वेल्डिंग जैसे कामों के लिए मजदूर अब 20,000 की जगह 30,000-33,000 मांग रहे हैं।
केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में 1.3 करोड़ प्रवासी मजदूर काम करते हैं। ये मुख्यतः यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे उत्तर और पूर्वी भारत से आते हैं। केरल में करीब 40 लाख प्रवासी श्रमिकों में से 70% पश्चिम बंगाल और असम के हैं। इन्होंने चुनाव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, पर वे वापसी के मूड में नहीं हैं।

