कॉर्पोरेट विवाद रातों रात नहीं होते, बोर्ड और संस्थागत निवेशकों को मिलकर मुद्दा हल करना चाहिए

मुंबई- कॉर्पोरेट विवाद रातों रात नहीं होते। यह हो सकता है कि संस्थागत शेयरधारकों द्वारा किए जा रहे कुछ कदम सफल नहीं हुए और इसलिए प्रमोटर्स और बोर्ड के बीच दरार देखने को मिली। यह ऐसा मामला है जिसे बोर्ड के अध्यक्ष के साथ बातचीत करके और उसके माध्यम से चिंताओं को व्यक्त करने के लिए संबोधित किया जा सकता है। यह बात सेबी के पूर्व चेयरमैन एम. दामोदरन ने कही।

दामोदरन कॉर्पोरेट गवर्नेंस कंपनी एक्सीलेंस एनबलर्स के चेयरमैन भी हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा हर मामला इस बात को साबित करता है कि जब ठीक से बातों का आदान-प्रदान नहीं होगा, तो संदेह, कलह और विवाद जन्म लेंगे और कॉर्पोरेट को तबाह कर देंगे। अच्छे कॉर्पोरेट गवर्नेंस में कॉर्पोरेट संस्थाओं को मजबूत करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि उनका बिजनेस प्रैक्टिस पारदर्शी रहे। अच्छा डिस्कलोजर रहे। शेयरधारकों का हित उनके लिए प्राथमिकता सूची में रहे।

दामोदरन ने कहा कि एक तरफ बड़े संस्थागत शेयरधारकों और दूसरी तरफ संबंधित कंपनियों के प्रमोटर्स बोर्ड और उनके प्रबंधन के बीच हाई-प्रोफाइल गतिरोध के कारण शेयरधारकों के अधिकारों पर सीमाएं एक बार फिर से चर्चा में है। जब कोई शेयरधारकों के अधिकारों के बारे में सोचता है, तो हमेशा छोटे रिटेल शेयरधारक के बारे में चिंता होती है और बड़े संस्थागत शेयरधारकों के बारे में बहुत कम चिंता जताई जाती है।

वे कहते हैं कि कई मौकों पर, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक, संस्थागत शेयरधारक प्रमोटर और बोर्ड में असंतोष या अविश्वास दिखाते रहे हैं। इसका इलाज कई बार बोर्ड की जनरल मीटिंग बुलाकर किया जाता है। इसमें कुछ बोर्ड सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखाया जाता है। कुछ मामलों में बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स पर ही गाज गिरा दी जाती है।

दामोदरन का कहना है कि ऐसे सभी विवादों में, सबसे पहले जांच की जानी चाहिए कि असंतोष कब पैदा हुआ, और क्या यह कंपनी से संबंधित किसी विशेष घटना से प्रेरित था। इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि संस्थागत शेयरधारक और प्रमोटर/कंपनी के बीच अच्छे संबंध खराब यूं ही इतनी जल्दी नहीं हो जाते हैं।

उनका कहना है कि संस्थागत शेयरधारकों को यह समझना चाहिए कि कंपनी के हित सर्वोपरि होते हैं। इसलिए, कोई भी कदम, चाहे कितनी भी अच्छी मंशा से उठाए जाएं, विघटनकारी नहीं होना चाहिए। कंपनी द्वारा किए जा रहे बिजनेस के रास्ते में रुकावट नहीं बननी चाहिए। एक लिस्टेड कंपनी को अपने बिजनेस को चलाने के लिए एक सही ढंग से गठित निदेशक मंडल (Board of Directors) की जरूरत होती है। और इसलिए बिना किसी विकल्प की तलाश किये बिना बोर्ड को अस्थिर करना शेयरधारकों के असंतोष को हल करने का कोई जवाब नहीं होता है।

दामोदरन का कहना है कि साथ ही, प्रमोटर्स और बोर्डों को कॉरपोरेट गवर्नेंस के संबंध में, बड़े या छोटे शेयरधारकों की वैध चिंताओं (legitimate concerns) और बिजनेस ऑपरेशन के तरीके को भी ध्यान में रखना होगा। शेयरधारकों के बीच एक रचनात्मक बातचीत संघर्ष को खत्म नहीं तो कम जरूर कर सकती है। शेयरधारकों के बीच मतभेदों से निजात पाने के लिए न तो मीडिया और न ही कोर्ट का दरवाजा खटखटाने में जल्दबाजी करनी चाहिए।

दामोदरन ने कहा कि सवाल यह भी उठता है कि जब प्रमोटर और बोर्ड उठाए जा रहे मुद्दों पर ध्यान नहीं देते हैं तो एक बड़े शेयरधारक को क्या राहत मिलती है। यदि शेयरधारकों का असंतोष लाइलाज स्तर तक पहुंच जाता है, तो मुद्दे को हल करने का एक संभावित तरीका पूरे बोर्ड को बदलने के लिए एक सामान्य बैठक की मांग करना हो सकता है।

उनके मुताबिक, मांग पूरी नहीं होने की संभावित स्थिति में, शेयरधारक, स्वयं एक जनरल मीटिंग आयोजित करने की मांग कर सकता है। अब सवाल यह उठता है कि यदि सभी डायरेक्टर्स को बदलने का रिजोल्यूशन सफल हो जाता है तो आगे क्या होगा। कंपनी को बोर्डरूम में डायरेक्टर तो चाहिए ही। इसलिए, जब तक कि निर्धारित प्रक्रियाओं के माध्यम से रिप्लेस न हो जाए, रेजोल्यूशन में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) को एक अस्थायी बोर्ड नियुक्त करना चाहिए।

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