वामपंथ का आखिरी किला केरल भी ढहा, अब किसी राज्य में नहीं ‘लाल सत्ता’
मुंबई- भारत के राजनीतिक मानचित्र से वामपंथ (लेफ्ट) का आखिरी किला भी ढह गया है। कभी पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल जैसे राज्यों में अपनी जड़ें मजबूती से जमाने वाला वामपंथी आंदोलन अब चुनावी राजनीति के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। सोमवार को आए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने केरल में भी सत्ता की तस्वीर बदल दी है, जिसके बाद अब भारत के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं बची है। यह हार केवल एक चुनाव की हार नहीं है, बल्कि उस विचारधारा के लिए एक बड़ा संकट है जो दशकों तक भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण ध्रुव रही है।
केरल को वामपंथ की ‘आखिरी उम्मीद’ इसलिए माना जाता था क्योंकि पश्चिम बंगाल (2011) और त्रिपुरा (2018) में हार के बाद यही इकलौता राज्य था जहां लेफ्ट फ्रंट सत्ता में था। 2021 के चुनावों में पिनाराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ (LDF) ने दोबारा जीत हासिल कर 40 साल पुराना इतिहास बदला था, लेकिन 2026 के नतीजों ने उस सिलसिले को तोड़ दिया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, केरल में सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) का असर इतना गहरा था कि वामपंथी गठबंधन बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे रह गया। भ्रष्टाचार के आरोपों, आर्थिक कुप्रबंधन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। इसके अलावा, राज्य के पारंपरिक वोट बैंक में भी बड़ी सेंध लगी है। खासकर युवाओं और मध्यम वर्ग के मतदाताओं ने बदलाव के पक्ष में वोट किया, जिससे मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का ‘अजेय’ होने का दावा धराशाई हो गया।
भारतीय राजनीति में एक दौर ऐसा था जब वामपंथी दल केंद्र में सरकार बनाने और गिराने की ताकत रखते थे। पश्चिम बंगाल में लगातार 34 साल तक शासन करना एक विश्व रिकॉर्ड जैसा था। लेकिन 2011 में ममता बनर्जी ने उस किले को ऐसा ढहाया कि आज वहां लेफ्ट का एक भी विधायक विधानसभा में नहीं है। त्रिपुरा में भी 25 साल का शासन 2018 में भाजपा की लहर के सामने टिक नहीं सका।
केरल में वामपंथ की जड़ें बहुत पुरानी और गहरी थीं। साक्षरता, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधारों के मामले में ‘केरल मॉडल’ की चर्चा पूरी दुनिया में होती थी। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वक्त के साथ वामपंथी दल अपनी नीतियों को आधुनिक अर्थव्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम रहे।
भारत के किसी भी राज्य में सरकार न होना वामपंथी दलों (CPI, CPI-M) के लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा है। कभी लोकसभा में 60 से ज्यादा सीटें जीतने वाले ये दल अब दहाई के आंकड़े के लिए भी संघर्ष कर रहे हैं। केरल की हार इसलिए ज्यादा चुभने वाली है क्योंकि यह उनका सबसे मजबूत आधार था।
सियासी जानकारों का मानना है कि लेफ्ट की सबसे बड़ी समस्या ‘नए विजन’ की कमी रही है। जहां एक तरफ भाजपा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के साथ विकास को जोड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ क्षेत्रीय दल सामाजिक न्याय के नाम पर अपने वोट बैंक को एकजुट कर रहे हैं। ऐसे में लेफ्ट का पारंपरिक ‘वर्ग संघर्ष’ (Class Struggle) का नारा आज के दौर के मतदाताओं को, खासकर डिजिटल युग के युवाओं को उतना आकर्षित नहीं कर पा रहा है। केरल के नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल इतिहास और पुराने सुधारों के भरोसे सत्ता में वापसी संभव नहीं है।

