कर्मचारियों की कमी से एनसीएलटी में मामलों को निपटाने में लग रहा ज्यादा समय
मुंबई- इंसॉल्वेंसी कानून के जरिये 6 साल में भले ही 500 से अधिक मामलों को निपटाने में मदद मिली हो, पर कर्मचारियों की कमी से मामलों को सुलझाने में ज्यादा समय लग रहा है। इस तरह के मामलों में 330 दिन का समय तय किया गया है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) में कर्मचारियों की कमी तथा समाधान में लगने वाला अधिक समय दबाव वाली कंपनियों को समयबद्ध तरीके से समाधान पेश करने के लिहाज से चुनौती खड़ी करता है।
दिवाला एवं ऋण शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) में समाधान के लिए समयसीमा 330 दिन है। इसमें मुकदमेबाजी का भी समय है। जून के अंत तक 517 मामलों में समाधान के लिए 460 दिन लगे। जबकि उधारीदाताओं के रिकवरी की दर दावों की तुलना में 31 फीसदी रही।
शनिवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि कर्ज के बोझ तले जबी कंपनियों के लिए लाई गई आईबीसी की चमक फीकी नहीं पड़नी चाहिए। इस राह में उभरने वाले दबाव के संकेतों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। आईबीसी को 2016 में लाया गया था। इसके तहत इस वर्ष जून तक कुल 5,636 कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रियाएं शुरू हुईँ। इनमें से 517 मामलों के लिए एभनसीएलटी ने समाधान योजनाओं को मंजूरी दी।
एनसीएलटी के लिए 63 सदस्यों की संख्या को मंजूरी दी गई है लेकिन अभी वह इससे आधे के साथ काम कर रहा है। एनसीएलटी की कुल 28 शाखाएं हैं, जहां कुल 63 सदस्य होने चाहिए। इसके पास कोर्ट मास्टर, अधिकारी, सहायक रजिस्ट्रार और स्टेनोग्राफर की कमी है। एनसीएलटी बार एसोसिएशन के सचिव सौरभ कालिया ने कहा कि न्यायाधिकरण अभी आधे से भी कम सदस्यों के साथ काम कर रहा है। कई शाखाओं में तो कभी सुबह और कभी दोपहर में काम होता है।
एनसीएलटी के आंकड़े बताते हैं कि एक नवंबर, 2017 से 31 अगस्त 2022 के बीच आईबीसी के तहत कुल 31,203 मामले आए। इनमें से 85.84 फीसदी पर एनसीएलटी ने निर्णय दिया। एनसीएलटी के चेयरमैन रामलिंगम सुधाकर ने कहा कि आईबीसी के तहत निर्णय फायदेमंद रहा है। सदस्यों की कमी के बावजूद मुंबई, दिल्ली, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों में सुधार हुआ है।
कालिया ने कहा कि मौजूदा स्थिति न केवल ट्रिब्यूनल के कामकाज को प्रभावित कर रही है बल्कि लेनदारों, निवेशकों, तनावग्रस्त कंपनियों के कर्मचारियों और हजारों फंसे हुए घर खरीदारों सहित अन्य लोगों को भी प्रभावित कर रही है। सरकार को जरूरी ताकत और बुनियादी ढांचा मुहैया कराने पर ध्यान देना चाहिए। जून अंत तक लेनदारों े कुल 7.67 लाख करोड़ रुपये का दावा किया था। इसके बजाय उनको 2.35 लाख करोड़ रुपये की वसूली मिली।

