यूक्रेन बन रहा है खंडहर, लाशें उठाने वाला कोई नहीं मिल रहा   

मुंबई- रूस यूक्रेन में तबाही मचा रहा है। बुधवार को सातवें दिन भी खार्किव और कीव में रूसी सेना ने बम बरसाए। खार्किव में पिछले 24 घंटे में हुए हमलों में 21 लोग मारे गए। बुका, मारियुपोल और जितोमिर में भी हालात बेहद खराब हैं।  

रूस की धमकी के बाद 5 लाख से ज्यादा लोग यूक्रेन छोड़ चुके हैं। कीव, लीव समेत दूसरे शहरों के रेलवे स्टेशन पर लोगों का तांता लगा है। लोग ट्रेन के लिए दो-दो दिन से इंतजार कर रहे हैं। रूस और यूक्रेन के बीच भीषण जंग में फंसे भारतीय स्टूडेंट यूक्रेन में इंडियन एंबेसी के अधिकारियों के गैरजिम्मेदाराना रवैये को जीवनभर नहीं भूल पाएंगे।  

स्टूडेंट्स का कहना है कि भारत सरकार ने समय रहते सक्रियता न दिखाई होती तो एंबेसी के भरोसे तो वे माइनस 3 डिग्री के तापमान में अब तक बर्फ बन चुके होते। उन्होंने सरकार से ऐसे अधिकारियों पर एक्शन लेने की मांग की है। 

यूक्रेन में इंडियन एंबेसी ने 28 फरवरी को एक नोटिस जारी किया, जिसमें लिखा था- सभी इंडियन स्टूडेंट्स को सलाह दी जाती है कि वे आज भारत लौटने के लिए बॉर्डर पर पहुंचें। यूक्रेन सरकार ने स्पेशल ट्रेनों की व्यवस्था की है। 

कीव से 900 किलोमीटर का सफर तय कर रोमानिया बॉर्डर पहुंची मेडिकल यूनिवर्सिटी की सेकेंड ईयर की छात्रा अवंतिका कहती हैं कि नोटिस में यह नहीं बताया गया कि हम मिसाइलों के बीच रेलवे स्टेशन कैसे पहुंचे? 

नोटिस के बाद हमने कई फोन एंबेसी को लगाए लेकिन वहां से कोई रिस्पांस नहीं मिल रहा था। वॉट्सऐप पर हम जो मैसेज भेज रहे थे वे पढ़े तो जा रहे थे लेकिन उनका जवाब नहीं दिया जा रहा था। रिस्क लेकर हम जैसे तैसे रेलवे स्टेशन तक पहुंचे, वहां से दो ट्रेन बदलकर लवीव तक पहुंचे। 

अवंतिका बात करते- करते कहती हैं, “मैं आपको वीडियो भेजती हूं, आपको समझ में आ जाएगा कि इंडियन एंबेसी आखिर हमारे साथ कर क्या रही है? इतनी भी जगह नहीं है कि कैंम्प में हम ठीक से बैठ सकें।” 

ट्रेनों में ठुंसे हुए हम लवीव पहुंचे। कीव से करीब 450 किलोमीटर का 5- 6 घंटे का सफर हमने खड़े होकर तय किया। जितने लोग बैठे थे उससे तीन गुना लोग खड़े थे। ट्रेन में भीड़ की हालत ये थी कि टॉयलेट सीट्स पर भी खड़े होकर स्टूडेंट्स ने ये सफर किया। हमसे कहा गया था कि लवीव में इंडियन एंबेसी के कैंप लगे हैं, वहां से बॉर्डर तक बसों के जरिए हमें एंबेसी पहुंचाया जाएगा। 

लवीव के हालात देखकर हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई। यहां आकर हमें पता चला हमारे लिए यहां कुछ है ही नहीं। न बॉर्डर तक पहुंचने के लिए बस और न ही खाने पीने का इंतजाम। कैंप के हालात ये थे कि उसमें हम ठीक से खड़े भी नहीं हो सकते थे। यहां हमें रात भी गुजारनी थी। कंबल, मैट्रेसेस कुछ भी नहीं थे। 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *