10 टॉप शेयरों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 20 साल के लो पर, यह है लेवल

मुंबई- विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने हाल के महीनों में भारतीय बाजार में भारी बिकवाली की है। इससे देश की टॉप 10 लिस्टेड कंपनियों में एफआईआई की औसत हिस्सेदारी फ्री-फ्लोट मार्केट कैपिटलाइजेशन के लगभग 34% तक गिर गई है। यह पिछले दो दशकों का सबसे निचला स्तर है और ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान बने 37% के निचले स्तर से भी कम है। लेटेस्ट डेटा के अनुसार कुल मार्केट कैप में टॉप 10 स्टॉक्स की हिस्सेदारी घटकर 17% रह गई है, जबकि दिसंबर 2019 में यह 39% के पीक पर थी।

टॉप प्राइवेट बैंकों में से एक एक्सिस बैंक में एफआईआई की हिस्सेदारी जून 2014 के 68% से घटकर मार्च 2026 में फ्री-फ्लोट मार्केट कैप का 44% रह गई है। इसी तरह कोटक महिंद्रा बैंक में यह 59% से घटकर 36%, एचडीएफसी बैंक में 44% से घटकर 38% और देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टीसीएस में 63% से घटकर 34% रह गई है।

इसी दौरान इन्फोसिस, आईसीआईसीआई बैंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज में भी विदेशी संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। हालांकि आईसीआईसीआई बैंक और रिलायंस जैसी कुछ कंपनियों के मामले में यह गिरावट कम रही है। फिलहाल कम हिस्सेदारी और कम वैल्यूएशन इस हाई-क्वालिटी सेगमेंट को लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर्स के लिए आकर्षक बनाते हैं। जैसे-जैसे रुपये की गिरावट थमेगी और जियोपॉलिटिकल रिस्क कम होंगे, इस सेगमेंट में एफआईआई फ्लो में मीन रिवर्जन हो सकता है।

लार्ज-कैप बेहतर वैल्यू दे रहे हैं। विदेशियों की बिकवाली का सबसे ज्यादा असर इन्हीं पर पड़ा है। जब मैक्रो हालात बदलेंगे और विदेशी बिकवाली कम होगी तो लार्ज-कैप शेयरों का प्रदर्शन स्मॉल-कैप शेयरों से बेहतर रहने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि स्मॉल-कैप्स एक बहुत ही डाइवर्सिफाई एरिया है जहां कमाई में बढ़ोतरी के नतीजे अलग-अलग होते हैं। लेकिन लार्ज-कैप की कमाई में बढ़ोतरी आमतौर पर 5% से 20% के बीच सीमित दायरे में रहती है।

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