आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल ने लॉन्च किया कांट्रा फंड एनएफओ, 12 अक्तूबर को होगा बंद

मुंबई- ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड ने ICICI प्रूडेंशियल कॉन्ट्रा फंड लॉन्च किया है। यह एक ओपन-एंडेड इक्विटी स्कीम है जो कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी (बाजार के आम रुझान के उलट निवेश करने की रणनीति) पर काम करती है। कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टमेंट इस सोच पर आधारित है कि बाजार अक्सर एसेट्स की गलत कीमत तय करते हैं और यह गलत कीमत तय होना हर एसेट क्लास (चाहे वह इक्विटी हो, डेट हो या रियल एस्टेट) की एक स्वाभाविक विशेषता है।

यह स्कीम ऐसे मौकों की पहचान करने के लिए आम राय से हटकर और रिसर्च पर आधारित तरीका अपनाती है। इसका लक्ष्य ऐसे निवेशक हैं जो लंबे समय के नजरिए से निवेश करना चाहते हैं और बाजार के मूड या धारणा के बदलने का इंतजार करने को तैयार हैं। इस स्कीम को संकरन नरेन, धर्मेश कक्कड़, साक्षात गोयल और गौरव चिकने मिलकर मैनेज करेंगे।

ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड के ED और CIO संकरन नरेन ने कहा, “कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग का मतलब सिर्फ़ सस्ती चीज़ें खरीदना नहीं है। इसके लिए मजबूत रिसर्च और लंबे समय का नजरिया चाहिए। कॉन्ट्रेरियन इन्वेस्टिंग की खासियत यह है कि हम तब खरीदते हैं जब किसी स्टॉक की मांग कम हो, जब खरीदारों के मुकाबले बेचने वाले ज़्यादा हों और इसलिए उसकी कीमत काफी गिर गई हो।”

उनके मुताबिक, इस स्कीम में अलग-अलग मार्केट कैपिटलाइजेशन में निवेश करने की सुविधा है, लेकिन हमारा मुख्य फोकस उन स्टॉक्स की पहचान करना होगा जिनका प्रदर्शन खराब रहा है। जरूरी बात यह है कि रिसर्च के जरिए सही निवेश को पहचाना जाए और इंतजार करने का धैर्य रखा जाए, क्योंकि कॉन्ट्रेरियन स्थिति में बदलाव जल्दी नहीं आता।

स्कीम की कॉन्ट्रा स्ट्रैटेजी किसी एक फ़ैक्टर या कई फ़ैक्टर के कॉम्बिनेशन पर आधारित हो सकती है, जिन्हें VCTS फ़्रेमवर्क के तहत व्यवस्थित किया गया है। पोर्टफ़ोलियो बनाने के मामले में CLOUD अप्रोच अपनाने का लक्ष्य है, जिसका मतलब है:

Calculate (गणना): कोई भी फ़ैसला लेने से पहले रिसर्च करें और गणना करें

Leverage (लीवरेज): लीवरेज्ड स्टॉक्स के मामले में सावधानी बरतें

Ownership (ओनरशिप): कम इंस्टीट्यूशनल ओनरशिप एक सकारात्मक बात हो सकती है

Upside (अपसाइड): अपसाइड की साफ़ संभावना

Disruption (डिसरप्शन): डिसरप्शन के जोखिम को लेकर सावधानी

निवेश शुरू करते समय टीम आम राय से हटकर सोच-समझकर रास्ता चुन सकती है। यह ऐसी कंपनियाँ ढूंढती है जिनका डेट-टू-इक्विटी रेश्यो सही हो, संस्थागत हिस्सेदारी पर नजर रखती है और ऐसे मौकों की तलाश करती है जहाँ सेंटीमेंट कमजोर हो लेकिन सामान्य होती कमाई से आगे बढ़ने की संभावना हो। साथ ही, यह उन सेक्टरों का भी ध्यान से मूल्यांकन करती है जिनमें बड़े बदलाव या उथल-पुथल हुई हो। जब ‘कॉन्ट्रेरियन मिसप्राइसिंग’ (बाजार की गलत समझ के कारण गलत कीमत) खत्म हो जाए, सेंटीमेंट बदल जाए, या कोई बेहतर स्टॉक मिल जाए (जिससे निवेश का कोई और बेहतर आइडिया मिल सके), तब उस स्टॉक से बाहर निकला जा सकता है।

मार्केट के हर कोने में गलत प्राइसिंग (mispricing) होती है, जिससे कॉन्ट्ररियन (बाज़ार के आम रुख के उलट) मौके बनते हैं। इस उलझन में कई चुनौतियां शामिल हैं, जैसे ग्लोबल ग्रोथ की चिंताएं, वेस्ट-एशिया में तनाव, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) का पैसा निकालना, सेक्टर में बड़े बदलाव, सेंट्रल बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी, साइक्लिक मंदी, बहुत ज़्यादा कर्ज वाली कंपनियां, वैल्यूएशन और कमाई, और रुपये की गिरती कीमत वगैरह।

उदाहरण के लिए अमेरिका में S&P 500 इंडेक्स की टॉप 10 कंपनियों का हिस्सा अब 38% है, जबकि 2016 में यह 19% था। ऐसा इसलिए है क्योंकि कुछ चुनिंदा कंपनियों का दबदबा और AI को लेकर भारी उत्साह वैल्यूएशन को ऐतिहासिक ऊंचाई पर ले जा रहा है। इसके उलट, भारत में मार्केट में ज़्यादा कंपनियों की भागीदारी दिखती है, लेकिन अलग-अलग सेक्टर से मिलने वाला रिटर्न मिला-जुला और असमान है। यह अंतर भारत में कॉन्ट्ररियन मौके दिखाता है, जहां पिछड़ने वाले सेक्टर साइक्लिकल रिकवरी के लिए अच्छी स्थिति में हैं क्योंकि मार्केट की असमानताएं कम हो रही हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *