उतार-चढ़ाव वाले बाजार में बिना रोक-टोक एसेट अलोकेशन पर दें जोर -एस. नरेन
मुंबई- भारतीय इक्विटी बाजार एक मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिका में ब्याज दरों का बढ़ना, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, देशों के बीच तनाव और विदेशी निवेश का कम इनफ्लो बाजार में उतार-चढ़ाव को बढ़ा रहे हैं। साथ ही, अमेरिका के नेतृत्व वाले एआई निवेश चक्र ने वैश्विक पूंजी का एक बड़ा हिस्सा अपनी ओर खींचा है, जिससे उभरते बाजारों के लिए निकट भविष्य का माहौल और चुनौतीपूर्ण हो गया है। फिर भी, निवेशकों को भारत की मजबूत घरेलू आर्थिक बुनियाद को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए।
ICICI प्रूडेंशियल AMC के ED और CIO संकरन नरेन का मानना है कि निवेशकों को तीन सिद्धांतों पर ध्यान देना चाहिए। इनमें एसेट एलोकेशन, बिना किसी रोक-टोक के निवेश और निवेश बनाए रखना।
नरेन कहते हैं कि लंबे समय में संपत्ति बनाने के लिए इक्विटी एक अहम जरिया है, लेकिन इसमें लंबे समय तक उतार-चढ़ाव भी हो सकता है। नरेन का मानना है कि निवेशकों को ऐसे पोर्टफोलियो बनाने से बचना चाहिए जो बहुत ज़्यादा किसी एक एसेट क्लास पर निर्भर हों। निवेशकों को सिर्फ इक्विटी फंड चुनने के बजाय एसेट एलोकेशन (संपत्ति का बंटवारा) अपनाना चाहिए। इक्विटी, डेट और दूसरी एसेट क्लास का सही मिश्रण निवेशकों को बाजार के अलग-अलग दौर से निपटने और किसी एक एसेट क्लास पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है। हाइब्रिड और एसेट-एलोकेशन पर आधारित रणनीतियां निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में विविधता लाने में मदद कर सकती हैं, खासकर तब जब बाजार की स्थिति साफ न हो।
‘कॉन्ट्रारियन इन्वेस्टिंग’ अपनाकर हाल के विजेताओं से आगे देखें
बाजार में उतार-चढ़ाव के दौर उन निवेशकों के लिए भी मौके पैदा कर सकते हैं जो हाल के परफ़ॉर्मेंस से आगे की सोच सकते हैं। यहीं पर ‘कॉन्ट्रारियन अप्रोच’ काम आ सकती है। ‘कॉन्ट्रा स्ट्रैटेजी’ आम तौर पर ऐसे स्टॉक्स और सेक्टर्स की तलाश करती है जिनका परफ़ॉर्मेंस कुछ समय से खराब रहा हो। इसका मकसद ऐसे मौके खोजना होता है जहां फंडामेंटल्स में आगे चलकर सुधार हो सकता है या जहां वैल्यूएशन से लॉन्ग-टर्म पोटेंशियल का सही अंदाजा नहीं लग पा रहा हो।
नरेन को बाजार के अलग-अलग हिस्सों में मौके दिख रहे हैं, जिनमें मिड और स्मॉल-कैप स्टॉक्स भी शामिल हैं, जहां कुछ सेक्टर्स में खराब परफ़ॉर्मेंस ज़्यादा साफ तौर पर दिखी है। वे कहते हैं, “कॉन्ट्रारियन इन्वेस्टिंग का मतलब है हाल के सफल ट्रेंड्स से हटकर सोचना। बाजार के साइकल में अलग-अलग समय पर लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप में मौके मिल सकते हैं। जरूरी बात यह है कि अच्छी तरह रिसर्च करके असल में खराब परफ़ॉर्मेंस वाले स्टॉक्स की पहचान की जाए और इन्वेस्टमेंट थीसिस के सही साबित होने का इंतजार करने का सब्र रखा जाए।” अहम बात यह है कि कॉन्ट्रारियन होने का मतलब सिर्फ़ सस्ते स्टॉक्स खरीदना नहीं है। बाजार के साइकल के आधार पर वैल्यू, ग्रोथ या क्वालिटी सभी कॉन्ट्रारियन मौके बन सकते हैं। अभी ICICI प्रूडेंशियल कॉन्ट्रा फंड का NFO चल रहा है और यह 12 अक्टूबर तक खुला रहेगा।
जो निवेशक पोर्टफोलियो बनाने में ज़्यादा लचीलापन चाहते हैं, वे स्पेशलाइज़्ड इन्वेस्टमेंट फंड (SIF) पर विचार कर सकते हैं। SIF का ढांचा फंड मैनेजरों को अलग-अलग तरह की निवेश रणनीतियां अपनाने के लिए ज़्यादा लचीलापन देता है। हालांकि, निवेशकों को इस कैटेगरी पर विचार करने से पहले इसके जोखिम और रिटर्न की विशेषताओं को समझ लेना चाहिए।
उतार-चढ़ाव निवेश से बाहर निकलने की वजह नहीं है
अनिश्चित बाजार के दौरान निवेशकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि वे बाजार में थोड़े समय के उतार-चढ़ाव के आधार पर अपने निवेश प्लान को न छोड़ें। यह समझना जरूरी है कि बाजार के उतार-चढ़ाव (साइकिल) निवेश का एक स्वाभाविक हिस्सा हैं। कमजोरी के दौर निवेशकों के धैर्य की परीक्षा ले सकते हैं, लेकिन गिरावट के बाद निवेश से बाहर निकलने का मतलब यह भी हो सकता है कि आप बाद में होने वाली रिकवरी का फायदा न उठा पाएं।
नरेन कहते हैं, “निवेशकों को अपने निवेश प्लान पर टिके रहना चाहिए और बाजार में थोड़े समय के उतार-चढ़ाव के आधार पर फ़ैसले नहीं लेने चाहिए। बाजार के उतार-चढ़ाव सामान्य हैं और सफल निवेश के लिए धैर्य रखना बहुत जरूरी है।”

