शापुरजी पलोनजी ने कहा, टाटा संस की लिस्टिंग जरूरी, इससे पारदर्शिता आएगी
मुंबई- टाटा संस में करीब 18 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले शापूरजी पलोनजी समूह ने कंपनी की लिस्टिंग का मजबूती से समर्थन किया है। समूह के चेयरमैन शापूरजी पलोनजी मिस्त्री ने कहा है कि इसका मकसद किसी एक पक्ष की जीत नहीं, बल्कि टाटा संस्थान को और मजबूत बनाना है। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में करीब 66 फीसदी हिस्सेदारी है और वह कंपनी का सबसे बड़ा शेयरधारक है।
मिस्त्री का यह बयान टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के उस रुख के एक दिन बाद आया है, जिसमें उन्होंने टाटा संस की लिस्टिंग का विरोध किया था। मिस्त्री ने कहा, “मकसद किसी एक पक्ष की जीत नहीं है। मकसद एक मजबूत टाटा संस्थान, मजबूत परोपकारी काम, ज्यादा जवाबदेही, बेहतर साझेदारी और आखिर में देश की बेहतर सेवा है।”
मिस्त्री ने भारतीय रिजर्व बैंक के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि इससे टाटा संस के आगे के रास्ते को लेकर पूरी तस्वीर साफ हो गई है। टाटा संस को आरबीआई के नियमों के तहत ऊपरी स्तर की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी के रूप में रखा गया था। इस व्यवस्था के तहत कंपनी के लिए लिस्टिंग का रास्ता तय हुआ था। अब आरबीआई ने टाटा संस की अपना पंजीकरण छोड़ने की अर्जी खारिज कर दी है और कंपनी को जल्द जरूरी नियमों का पालन करने के लिए कहा है।
17 सितंबर को टाटा संस की बोर्ड बैठक में नोएल टाटा ने कहा था कि आरबीआई के 11 सितंबर के आदेश में साफ तौर पर यह नहीं कहा गया है कि टाटा संस की लिस्टिंग ही एकमात्र रास्ता है। नोएल टाटा का कहना था कि कंपनी के पास अभी दूसरे विकल्पों के लिए जगह है और टाटा संस को निजी कंपनी बनाए रखने के लिए आरबीआई के साथ आगे भी बातचीत करनी चाहिए।
मिस्त्री ने कहा कि टाटा संस की शेयर बाजार में लिस्टिंग को केवल पैसे या नियमों से जुड़ा मामला नहीं माना जाना चाहिए। उनके मुताबिक इससे देश के सबसे बड़े कारोबारी संस्थानों में से एक में पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि इस फैसले को किसी एक शेयरधारक की दूसरे पर जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके बजाय यह अलग-अलग शेयरधारकों और संस्थानों को साथ लाने का मौका हो सकता है।
दोनों कारोबारी समूहों के रिश्तों में सबसे बड़ा विवाद 2016 में सामने आया था। साइरस मिस्त्री को 2012 में टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया था, लेकिन 2016 में बोर्ड के भीतर चले विवाद के बाद उन्हें पद से हटा दिया गया था। उस समय टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन रतन टाटा थे।

