गिरावट वाले बाजार में निवेश के लिए बनाएं स्मार्ट आइडिया, यह है इसका नियम

मुंबई- भू-राजनीतिक संकट के बीच निवेशकों के लिए सबसे बड़ा खतरा सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं में आकर पैनिक सेलिंग करना है। व्हाइटओक कैपिटल म्युचुअल फंड की नई रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसे समय में सबसे सुरक्षित तरीका है अपनी पहले से तय एसेट एलोकेशन स्ट्रैटेजी पर टिके रहना। तेज उतार-चढ़ाव और डराने वाली खबरों के बावजूद लंबी अवधि में रिटर्न पर इसका असर सामान्यतः कम होता है। फंड हाउस का कहना है कि संकट के दौरान भावनाओं में आकर लिए गए निर्णय अक्सर निवेशकों के लिए वास्तविक संकट से ज्यादा नुकसानदेह साबित होते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एसेट एलोकेशन बाजार के झटकों को झेलने के लिए एक ढाल के रूप में काम करता है। अच्छी तरह से डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो में अनिश्चितता के दौर में सुरक्षा पहले से ही शामिल होती है। भू-राजनीतिक झटके लंबे समय के निवेश रिटर्न को खत्म नहीं करते। जब संकट आता है और बाजार गिरते हैं, तो आपके पोर्टफोलियो में इक्विटी का हिस्सा अपने आप प्रतिशत के हिसाब से कम हो जाता है। वहीं इक्विटी की तुलना में स्थिर रहने वाली डेट और गोल्ड का हिस्सा पोर्टफोलियो में बढ़ जाता है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक, अगर किसी निवेशक की रिस्क लेने की क्षमता मध्यम है तो वह 65 फीसदी शेयरों में, 25 फीसदी डेट में और बाकी 10 फीसदी गोल्ड में निवेश कर सकता है। उसे रीबैलेंसिंग के लिए 5 फीसदी कम या ज्यादा का बैंड रखना होगा। अगर शेयरों में ऐलोकशन घटकर 60 फीसदी से नीचे या बढ़कर 70 फीसदी से ऊपर चला जाता है तो उसे पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करना होगा।

किसी बड़ी घटना की प्रतिक्रिया में मार्केट में करेक्शंस की वजह से पोर्टफोलियो का ऐलोकेशन बदल जाता है। शेयर बाजार में गिरावट आने पर पोर्टफोलियो में शेयरों का हिस्सा पोर्टफोलियो की कुल वैल्यू के लिहाज से कम हो जाता है। साथ ही डेट या गोल्ड जैसे स्टेबल एसेट्स की हिस्सेदारी बढ़ जाती है। ऐसे में पोर्टफोलियो को रीबैलेंस करने के लिए आपके पास कम कीमत पर शेयर खरीदने का मौका होता है।

इस रिपोर्ट में एक उदाहरण के जरिए इसे समझाया गया है। मान लीजिए किसी इनवेस्टर के पोर्टफोलियो में 65 फीसदी शेयर और 35 फीसदी डेट है। फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन की लड़ाई शुरू होने पर बाजार में बड़ी गिरावट आई थी। इससे इनवेस्टर के पोर्टफोलियो में शेयरों की हिस्सेदारी घटकर 58 फीसदी पर आ गई। तब गिरावट की वजह से घबराहट में शेयर बेचने की जगह इनवेस्टर ने ऑरिजिनल एसेट ऐलोकेशन बनाए रखने के लिए डेट से पैसे निकालकर शेयरों में लगाया।

अगले 18 महीनों में बाजार में रिकवरी से पोर्टफोलियो की वैल्यू 25 फीसदी से ज्यादा चढ़ी। फंड हाउस ने बताया है कि ऐसे इनवेस्टर्स जो मार्केट में बड़ी गिरावट की वजह से शेयर बेच देते हैं उनके पोर्टफोलियो का प्रदर्शन कमजोर रहता है। इसकी वजह है कि एक बार शेयर बेचने के बाद मार्केट में तेजी के दौरान वे दोबारा निवेश नहीं कर पाते।

2008 में मुंबई में आतंकी हमलों के बाद भी मार्केट में रिकवरी आई थी। 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक और 2019 के बालाकोट स्ट्राइक का असर भी मार्केट पर थोड़े समय के लिए देखने को मिला था। 2020 में कोविड की महामारी के समय मार्केट में बड़ी गिरावट आई थी। तब निफ्टी करीब 32 फीसदी गिर गया था। लेकिन, चार महीनों में मार्केट में रिकवरी आ गई। 2022 में रूस-यूक्रेन की लड़ाई के बाद निफ्टी 18,000 से गिरकर 15,200 पर आ गया था। फिर यह 25,000 के ऊपर पहुंच गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *