चिन्मय मिशन के 75 वर्ष: सनातन परंपरा, वैश्विक एकता और आध्यात्मिक चेतना का भव्य महासंगम
Delhi: चिन्मय मिशन की 75वीं वर्षगांठ पर आयोजित भव्य आध्यात्मिक महासंगम आधुनिक भारत के आध्यात्मिक इतिहास में एक प्रेरक अध्याय बन गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर देश-विदेश की विविध हिंदू परंपराओं, मठों और आध्यात्मिक संस्थाओं के पूजनीय संतों, आचार्यों और धर्मगुरुओं ने एक मंच पर उपस्थित होकर सनातन संस्कृति की एकता, समावेशिता और वैश्विक संदेश को सशक्त स्वर दिया।
यह आयोजन केवल एक वर्षगांठ नहीं, बल्कि स्वामी चिन्मयानंद जी की कालजयी विरासत, उनके आध्यात्मिक पुनर्जागरण और विश्वभर में वेदांत के प्रसार के अतुलनीय योगदान को समर्पित श्रद्धांजलि बन गया। कार्यक्रम में उपस्थित संतों ने गुरुदेव को आधुनिक युग में भारतीय आध्यात्मिक चेतना के सबसे प्रभावशाली अग्रदूतों में से एक बताया।
रामकृष्ण मिशन के स्वामी शशिशिखानंद जी ने स्वामी चिन्मयानंद को “दूसरे विवेकानंद” की संज्ञा देते हुए कहा कि उन्होंने भारतीय अध्यात्म को वैश्विक मंच पर नई ऊर्जा और नई दिशा दी। माता अमृतानंदमयी मठ के स्वामी अमृत स्वरूपानंद जी ने गुरुदेव की राष्ट्रनिष्ठा को भारत की आध्यात्मिक शक्ति के प्रति उनकी गहरी आस्था का प्रतीक बताया।
इस्कॉन के मधु पंडित दास ने श्रील प्रभुपाद से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग साझा करते हुए बताया कि गुरुदेव ने सनातन धर्म की सार्वभौमिकता का समर्थन करते हुए विदेशी भक्तों के मंदिर प्रवेश के पक्ष में निर्णायक भूमिका निभाई थी। यह उनके समावेशी दृष्टिकोण और धर्म की व्यापकता का जीवंत उदाहरण है।
जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी ने स्वामी चिन्मयानंद को “आदि शंकराचार्य के ज्ञान-हंस अवतार” कहकर संबोधित किया और कहा कि उनकी आध्यात्मिक विरासत परंपराओं, सीमाओं और पीढ़ियों से परे मानवता को दिशा देती रहेगी।
चिन्मय मिशन का यह अमृत महोत्सव भारत की सनातन ज्ञान परंपरा, आध्यात्मिक एकात्मता और वैश्विक सांस्कृतिक नेतृत्व का जीवंत उत्सव बनकर उभरा, जिसने यह सिद्ध किया कि गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक, प्रेरक और विश्वमानव के लिए पथप्रदर्शक है।

