जरूरी दवाओं पर महंगाई की मार, 20% तक दाम बढ़ाने की तैयारी, इन पर असर
मुंबई- मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब दवाइयों के बिल पर भी पड़ने वाला है। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और सप्लाई चेन टूटने की वजह से सरकार जरूरी दवाओं की कीमतों में 10 से 20 प्रतिशत की अस्थाई बढ़ोतरी करने पर विचार कर रही है। इसमें कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं और एंटीबायोटिक्स भी शामिल हैं।
फार्मा कंपनियों का कहना है कि दवाओं को बनाने में इस्तेमाल होने वाले सॉल्वेंट्स यानी कच्चे माल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। ज्यादातर कच्चे माल पेट्रोकेमिकल उत्पाद होते हैं जो खाड़ी देशों से आते हैं। युद्ध की वजह से इनकी कीमतें बढ़ गई हैं और सप्लाई रुक गई है।
यह बढ़ोतरी ‘प्राइस कंट्रोल’ के तहत आने वाली दवाओं पर लागू हो सकती है। इनमें कैंसर में लगने वाली गंभीर बीमारियों के इलाज में काम आने वाले इंजेक्शन और गोलियां। अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले जीवन रक्षक इंजेक्शन।
सरकार इस बढ़ोतरी को एक ‘शॉर्ट-टर्म’ उपाय के तौर पर देख रही है। चर्चा है कि यह बढ़ोतरी कम से कम तीन महीने के लिए लागू की जा सकती है। जैसे ही खाड़ी देशों से सप्लाई सामान्य होगी और कच्चे माल के दाम गिरेंगे, दवाओं की कीमतें फिर से पुराने स्तर पर ले आई जाएंगी। वैसे कुछ कंपनियों ने 50% तक दाम बढ़ाने की मांग की थी, लेकिन सरकार केवल 10-20% की ‘कैलिब्रेटेड’ बढ़ोतरी के पक्ष में है।
कंपनियों के पास सॉल्वेंट्स का बड़ा स्टॉक रखने की भी सीमा है क्योंकि ये केमिकल काफी ज्वलनशील और असुरक्षित होते हैं। सरकार लोकहित में असाधारण परिस्थितियों का हवाला देकर कीमतों में बदलाव कर सकती है। एक बड़ी चुनौती यह है कि जब कीमतें वापस कम की जाएंगी, तो महंगे दाम पर बने पुराने स्टॉक का क्या होगा। इस पर अभी स्पष्टता आनी बाकी है।

