देश में महिला मुखिया वाले घरों में कम हुई दिहाड़ी, पक्की नौकरियों में आई तेजी
मुंबई- देश में महिलाओं की आर्थिक भूमिका सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रह गई। एसबीआई की रिसर्च रिपोर्ट में सामने आया है कि महिला मुखिया वाले परिवारों में रोजगार की गुणवत्ता तेजी से सुधर रही है।जब घर में महिला की चलती है, तो परिवार की निर्भरता असुरक्षित दिहाड़ी मजदूरी से हटकर सम्मानजनक नियमित वेतन वाली नौकरियों की ओर बढ़ जाती है। ऐसी महिलाओं में नियमित रोजगार की संभावना 4.4% बढ़ी है, जबकि दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भरता 4.2% घटी है। यह संकेत है कि महिलाएं संरक्षित रोजगार की ओर बढ़ रही हैं।
शहरी क्षेत्रों में जिन घरों की मुखिया महिला है, वहां नियमित वेतन वाली नौकरियों की संभावना 10 फीसदी तक बढ़ गई है। यह डेटा चौंकाने वाला है क्योंकि यह दर्शाता है कि महिलाएं अनिश्चित छोटे-मोटे व्यवसायों के बजाय स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा वाले कॉर्पोरेट या संस्थागत काम को प्राथमिकता दे रही हैं।
महिला नेतृत्व वाले ग्रामीण घरों में दिहाड़ी में शामिल होने की संभावना 5% घटी। इसकी जगह परिवार अब खुद के छोटे उद्यमों या नियमित काम की ओर बढ़ रहे हैं, जो उनकी बढ़ती बार्गेनिंग पावर को दर्शाता है।
अध्ययन में शिक्षा को भी महिलाओं के रोजगार बदलाव का बड़ा कारण बताया गया है। अशिक्षित महिलाओं में दिहाड़ी मजदूरी की संभावना सबसे ज्यादा है, लेकिन शिक्षा बढ़ने के साथ यह तेजी से घटती है। उच्च माध्यमिक और उससे ऊपर की पढ़ाई करने वाली महिलाओं में नियमित वेतन वाली नौकरी की संभावना सबसे अधिक पाई गई।
देश में महिला श्रम भागीदारी दर 40% तक पहुंच चुकी है। ग्रामीण महिलाओं की श्रम भागीदारी दर 45.9% और शहरों में महज 27.7% है। रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी प्रशिक्षण लेने वाली महिलाओं में स्वरोजगार की संभावना बढ़ी है। यदि प्रशिक्षण, रोजगार योजनाओं का विस्तार किया जाए तो महिलाओं को बेहतर रोजगार मिल सकता है।

