बफे को लो-प्रोफाइल भारतीय बिजनेस से 4,378 करोड़ की आय, पेटीएम में 40% नुकसान
मुंबई- मशहूर निवेशक वॉरेन बफे कभी भारत नहीं आए। फिर भी उनकी 95 लाख करोड़ रुपये की कंपनी बर्कशायर हैथवे ने यहां मजबूत कारोबारी जड़ें जमा लीं हैं। ग्रेग एबेल के सीईओ बनते ही इस ‘अनजान’ पोर्टफोलियो की असली तस्वीर सामने आ रही है।
एबेल को ऐसा भारतीय पोर्टफोलियो मिला, जो दशकों से चुपचाप बढ़ रहा है। पेटीएम में 26 करोड़ के निवेश पर 40% नुकसान झेलने वाली बर्कशायर की असली ताकत उसकी 58 गैर-लिस्टेड कंपनियों में हैं, जिनमें से कई भारत में सक्रिय हैं। इनसे बीते साल 4,378 करोड़ की आय हुई।
इंजन ऑयल से लेकर मेडिकल उपकरण तक, पाइप से लेकर शैंपू तक बर्कशायर का इंडिया कनेक्शन उतना ही गहरा है, जितना कम चर्चित। शुरुआत इंडियन ऑयल के साथ 60:40 जॉइंट वेंचर से। अब भारतीय कंपनी की हिस्सेदारी सिर्फ 26 फीसदी है।
मूल बिजनेस – मोबिलिटी एडिटिव्स- कार, ट्रक, 125 सीसी मोटरसाइकिलों के इंजन ऑयल की केमिस्ट्री। – दूसरा बड़ा दांव – सीपीवीसी पाइप रेजिन- ग्रासिम के साथ जॉइंट वेंचर, सालाना उत्पादन क्षमता 1 लाख टन।
एशियन पेंट्स, बर्जर पेंट्स, बिड़ला ओपस को उच्च गुणवत्ता वाले रेजिन्स और हाइपर-डिस्पर्सेंट्स की निर्बाध सप्लाई। – पॉलिहोस (चेन्नई) के साथ जॉइंट वेंचर-मेडिकल डिवाइस के लिए पॉलियूरेथेन्स की सप्लाई। – यूनिलीवर को शैंपू, साबुन और फार्मा फार्मा फॉर्मूलेशन के लिए पॉलिमर सप्लाई करती है।
– 30 करोड़ का टेक्नोलॉजी सेंटर निर्माणाधीन। यहां भारतीय इंजीनियर, भारतीय समस्याओं पर रिसर्च करेंगे। – रुपा ग्रुप के साथ पार्टनरशिप से आगे ब्रैडफोर्ड के जरिए नए पार्टनर की तलाश कर रही बफे की कंपनी। ई-कॉमर्स ओर क्विक कॉमर्स पर फोकस, वीमन इनरवियर में बड़ी संभावना देख रही बर्कशायर हैथवे। – देवयानी इंटरनेशनल से हाथ मिलाया।

