तेल के झटके से बॉन्ड बाजार हिला, म्यूचुअल फंडों ने बेचे ₹35,600 करोड़ के सरकारी बॉन्ड

मुंबई- ईरान युद्ध के चलते बढ़ती तेल कीमतों और महंगाई की आशंकाओं के बीच म्युचुअल फंड्स ने मार्च में अब तक भारतीय सरकारी बॉन्ड्स की रिकॉर्ड बिकवाली की है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ा है और डेट मार्केट में व्यापक गिरावट देखने को मिली है।

क्लियरिंग हाउस के आंकड़ों के मुताबिक, म्युचुअल फंड्स ने इस महीने अब तक 35,600 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड्स की शुद्ध बिकवाली की है, जो किसी भी महीने का अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के बीच कुछ एसेट मैनेजर्स ने रणनीति बदलते हुए शॉर्ट-ड्यूरेशन कॉरपोरेट डेट की ओर रुख किया है, जहां उन्हें बेहतर वैल्यू नजर आ रही है।

ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने से महंगाई की चिंताएं और बढ़ गई हैं। इसके चलते रुपया कमजोर होकर 93 प्रति डॉलर के पार रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, जिससे निवेशक सरकारी और कॉरपोरेट बॉन्ड दोनों पर ज्यादा यील्ड की मांग कर रहे हैं।

कॉरपोरेट बॉन्ड्स पर दबाव सरकारी बॉन्ड्स की तुलना में ज्यादा रहा है, जो बाजार में बढ़ते जोखिम (risk-off sentiment) के अनुरूप है। LSEG के अनुसार, 2-5 साल की अवधि वाले AAA-रेटेड कॉरपोरेट बॉन्ड की यील्ड 20-25 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ गई है, जबकि समान अवधि के सरकारी बॉन्ड की यील्ड में 10 बेसिस प्वाइंट से भी कम बढ़ोतरी हुई है।

कॉरपोरेट बॉन्ड्स “जोखिम-रिटर्न (risk-reward) के नजरिये से ज्यादा आकर्षक” हो गए हैं। म्युचुअल फंड्स द्वारा सरकारी बॉन्ड्स की बिकवाली ईरान युद्ध के चलते बढ़ी सतर्कता को दर्शाती है। साथ ही, कॉरपोरेट बॉन्ड्स में बेहतर वैल्यू भी दिख रही है। फंड मैनेजर्स मौजूदा बाजार परिस्थितियों का फायदा उठाने के लिए अपनी रणनीतियों में बदलाव कर रहे हैं।

रणनीति मुख्य रूप से उन सेगमेंट्स की ओर शिफ्ट होने की है, जहां बेहतर कैरी (carry) और रिलेटिव वैल्यू मिल रही है।”मध्यम अवधि (moderate-duration) वाले फंड 1-3 साल की एक्रूअल रणनीति को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि एक्टिव ड्यूरेशन स्ट्रैटेजी के तहत लंबी अवधि वाले राज्य ऋण (state debt) और मनी मार्केट सिक्योरिटीज में चुनिंदा निवेश किया जा रहा है।

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