युद्ध खत्म होने के बाद दिखेगी पूरी दुनिया में मंदी, दाने-दाने को मोहताज होंगे
मुंबई-दुनिया पहले ही मुश्किल दौर से गुजर रही थी। ग्रोथ बेहद धीमी थी। अब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच तनाव ने ताबूत में कील ठोंकने का काम कर दिया है। इस युद्ध के शुरू होने के बाद बाद से ही आर्थिक मंदी की आशंकाए बढ़ गईं। तेल की कीमतों में तेजी ने ऐसा किया। ये बढ़कर 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गईं।
अमूमन अब तक जो भी युद्ध हुए हैं, उनके खत्म होने के बाद कई देश मंदी की चपेट में आ गए हैं। इस बार के युद्ध में ईरान, इजराइल, अमेरिका सहित खाड़ी देश और पश्चिमी एशिया के कई देश चपेट में हैं। इनको जबरदस्त नुकसान हुआ है। उनकी वजह से दुनियाभर के कई और देशों को भी मंदी का सामना करना पड़ सकता है।
2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यह पहली बार था जब तेल की कीमतें 100 डॉलर के स्तर से ऊपर गईं। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 24% की बढ़ोतरी हुई। यह 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। कीमतों में यह उछाल मिडिल ईस्ट में उत्पादन में आई रुकावटों के कारण देखने को मिला। प्रमुख तेल उत्पादक देशों ने होर्मुज स्ट्रेट के लगातार बंद रहने के कारण अपने उत्पादन में कटौती कर दी। आमतौर पर दुनिया की कुल तेल सप्लाई का लगभग पांचवां हिस्सा इसी पानी के रास्ते से होकर गुजरता है।
कीमतों में आई इस अचानक और तेज बढ़ोतरी ने दुनिया के शेयर बाजारों में हड़कंप मचा दिया। वॉल स्ट्रीट से लेकर दलाल स्ट्रीट पर इसका असर है। जानकारों का मानना है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच का यह टकराव जल्द ही शांत नहीं हुआ और तेल की कीमतें वापस नीचे नहीं आईं तो 100 डॉलर के स्तर को पार कर जाना अर्थव्यवस्था के लिए एक ‘ब्रेकिंग पॉइंट’ (संकट का पीक पॉइंट) साबित हो सकता है।
कीमतों में इस ताजा उछाल से पहले भी अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर तेल की कीमतें 120 डॉलर के करीब पहुंचती हैं तो इससे आर्थिक मंदी का खतरा काफी हद तक बढ़ सकता है।
अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मंदी में जाने का मतलब है दुनिया के लिए आर्थिक संकट में पहुंचना। भारत भी इस पूरे घटनाक्रम से अछूता नहीं रहने वाला है। अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वह दुनिया पर बहुत ज्यादा निर्भर है। फिर चाहे क्रूड के लिए हो या एलपीजी और पीएनजी के लिए। भारत में एलपीजी संकट गहराता जा रहा है। आने वाले दिनों में महंगाई को हवा दे सकता है और डिमांड को सीधी चोट पहुंचा सकता है।
अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने भी चेतावनी दी कि तेल की कीमतें 120 डॉलर तक पहुंचने से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। कीमतों में इस स्तर की बढ़ोतरी से ‘हेडलाइन इन्फ्लेशन’ के आंकड़ों में लगभग 1 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। इससे आर्थिक मंदी का खतरा और भी बढ़ जाएगा।
क्रुगमैन ने कहा कि उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं है कि सिर्फ तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण ही कोई बड़ी आर्थिक मंदी आ जाएगी या महंगाई पूरी तरह से बेकाबू हो जाएगी। लेकिन, उन्होंने साथ ही यह चेतावनी भी दी कि मौजूदा व्यापक आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए यह स्थिति काफी नाजुक बनी हुई है।

