भारतीय निर्यातकों के अरबों डॉलर के सामान वाले 45000 कंटेनर दुनियाभर में फंसे

मुंबई-  पश्चिम एशियाई युद्ध का असर भारतीय निर्यातकों पर साफ दिख रहा है। लॉजिस्टिक्स क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों के मुताबिक, लगभग 40,000-45,000 भारतीय कंटेनर फिलहाल या तो रास्ते में फंसे हुए हैं या अंतरराष्ट्रीय बंदरगाहों पर अटके हुए हैं। करीब 1-1.5 अरब डॉलर के निर्यात माल का भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है, क्योंकि या तो इसके लिए मार्ग बदलना पड़ेगा या फिर भारत की ओर रुख करना पड़ेगा, जिससे लागत में और भी बढ़ोतरी होगी।

शिपिंग कंपनियों द्वारा लगाए गए कई आकस्मिक शुल्कों के कारण प्रति कंटेनर लागत में तीन से पांच गुने तक की वृद्धि हो रही है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी कारणों से लागत में लगातार वृद्धि हो रही है, जिससे कंटेनर संकट की स्थिति पैदा हो सकती है और जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के निर्यातकों को और भी ज्यादा नुकसान हो सकता है। अटके हुए माल में बासमती चावल का एक बड़ा हिस्सा है, जो 4 लाख टन है।

भारतीय निर्यात से संबंधित लगभग 40,000-45,000 कंटेनर फंसे हुए हैं और उनमें से लगभग 80 प्रतिशत समुद्री मार्ग में हैं। मोटे अनुमानों के अनुसार, हवाई और समुद्री दोनों मार्गों पर लगभग 1-1.5 अरब डॉलर मूल्य का माल फंसा हुआ है।’ जल्दी खराब होने वाले सामान का निर्यात करने वालों के लिए इसका मतलब संपूर्ण नुकसान युद्ध जोखिम अधिभार, जिनमें आपातकालीन लागत वसूली शुल्क (ईसीआरसी), आकस्मिक शुल्क और पीक सीजन शुल्क आदि शामिल हैं, निर्यातकों के मुनाफे को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं।

कई निर्यातक बैक-टू-टाउन (बीटीटी) विकल्प के लिए आवेदन करने पर विचार कर रहे हैं। यह एक सीमा शुल्क प्रक्रिया है जो निर्यातकों को निर्यात प्रक्रिया में शामिल होने के बाद बंदरगाह से माल वापस लेने और उसे घरेलू बाजार में वापस लाने की अनुमति देती है।

हालांकि, निर्यातकों को प्रति कंटेनर 3,000-5,000 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क भी देना पड़ रहा है, जिससे उन्हें नुकसान हो रहा है। यह उच्च जोखिम लागत के कारण हो रहा है। अरब सागर में माल ढुलाई भी अब जोखिम भरी हो गई है।’ यह उसी मार्ग पर सामान्य दिनों में प्रति कंटेनर 800-1,500 डॉलर की मौजूदा औसत माल ढुलाई लागत के अतिरिक्त है।

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