सरकारी कंपनियों से आईपीओ के जरिये 2030 तक 20 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य

मुंबई- सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में 2029-30 तक आईपीओ के जरिये हिस्सा बेचकर 1.79 लाख करोड़ रुपये (20 अरब डॉलर) जुटाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, कंपनियों के पूरी तरह से निजीकरण की योजना को टाल दिया गया है। सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने सोमवार देर रात जारी एक रिपोर्ट में कहा, ये प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) अगले चार वर्षों में सरकारी संपत्तियों का मुद्रीकरण करके 183.7 अरब डॉलर जुटाने के प्रयास का हिस्सा होंगे।

नीति आयोग ने बताया, रेलवे, बिजली, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, विमानन और कोयला क्षेत्रों की कंपनियों के आईपीओ आएंगे। ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिसंपत्ति मुद्रीकरण की दूसरी चार वर्षीय योजना का हिस्सा हैं। पहली योजना के तहत 2024/25 तक 5.3 लाख करोड़ रुपये जुटाए गए थे। यह सरकार के 6 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य का लगभग 90% है।

सरकार का लक्ष्य आईपीओ के माध्यम से सात रेलवे कंपनियों में हिस्सा बेचना है, जिससे 2030 तक संभावित रूप से 837 अरब रुपये मिल सकते हैं। रिपोर्ट में हालांकि, कंपनियों के नाम नहीं बताए गए हैं। सरकार का लक्ष्य अगले वित्त वर्ष में शेयर बाजार में लिस्टिंग के माध्यम से 170 अरब रुपये जुटाना है। 2027-28 में गेल (इंडिया) की सहायक कंपनी गेल गैस को सूचीबद्ध करने की योजना है। इससे 31 अरब रुपये जुटाए जा सकेंगे।

सरकार ने अगले चार वर्षों में सरकारी बिजली कंपनियों की सहायक कंपनियों को सूचीबद्ध करके 310 अरब रुपये जुटाने की भी योजना बनाई है। साथ ही, कोल इंडिया की सहायक कंपनियों और एनएलसी इंडिया की नवीकरणीय ऊर्जा संपत्तियों के आईपीओ से 483 अरब रुपये जुटाने की भी योजना है। भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अपनी एक सहायक कंपनी और निजी साझेदारों के साथ संयुक्त उद्यम के माध्यम से स्वामित्व वाले चार हवाई अड्डों में अपनी हिस्सेदारी बेचेगा।

केंद्र सरकार को पहले सरकारी कंपनियों के पूर्ण निजीकरण के माध्यम से धन जुटाने में कठिनाई होती थी और हाल ही में उसने पुनर्निवेश के लिए पूंजी जुटाने हेतु इन कंपनियों की परिसंपत्तियों और सहायक कंपनियों के मुद्रीकरण पर ध्यान केंद्रित किया है।

2024 के आम चुनावों में पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद मोदी सरकार ने सरकारी कंपनियों के निजीकरण की योजना को स्थगित कर दिया। संपत्ति मुद्रीकरण के माध्यम से जुटाई गई धनराशि सीधे कंपनियों को पुनर्निवेश के लिए दी जाती है और इससे सरकारी संस्थाओं के रूप में इन कंपनियों की स्थिति बनाए रखते हुए इनके पुनर्पूंजीकरण के लिए सरकारी वित्त पर पड़ने वाला बोझ कम हो सकता है।

कंपनियों में कम हिस्सेदारी की बिक्री और निजीकरण सरकार की बजट घाटे को कम करने की योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हालांकि, सरकार ने 2024 के बाद विनिवेश के लिए विशिष्ट लक्ष्य निर्धारित करना बंद कर दिया है।

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